शनिवार, 29 नवंबर 2014

श्री जिनदत्त-कुशलसूरि खरतरगच्छ पेढी की साधारण सभा की बैठक ता. 27 फरवरी 2015 को दोपहर 2 बजे कन्याकुमारी में पूज्य गुरुदेव उपाध्याय श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. की पावन निश्रा एवं पेढी के अध्यक्ष श्री मोहनचंदजी ढड्ढा की अध्यक्षता में आयोजित होगी।

पेढी की जनरल मीटींग कन्याकुमारी में


कन्याकुमारी में श्री महावीर स्वामी जिन मंदिर, दादावाडी एवं गुरुमंदिर की अंजनशलाका प्रतिष्ठा ता. 27 पफरवरी 2015 को प्रात: 8 बजे संपन्न होगी।
पेढी के महामंत्री संघवी श्री वंशराजजी भंसाली ने बताया कि इस अवसर पर पेढी के समस्त सदस्यों से पधारने का हार्दिक अनुरोध है।

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

अखिल भारतीय श्री जिनदत्त-कुशलसूरि खरतरगच्छ पेढी की बैठक 14 सितम्बर को इचलकरंजी में

     अखिल भारतीय श्री जिनदत्त-कुशलसूरि खरतरगच्छ पेढी की बैठक 14 सितम्बर को इचलकरंजी महाराष्ट्र में होगी।
     बैठक पू. मरूधर मणि उपाध्याय प्रवर श्री मणिप्रभसागरजी म. की पावन निश्रा व ट्रस्ट के अध्यक्ष मोहनचंदजी ढड्ढा की अध्यक्षता में होगी। इस हेतु सभी ट्रस्टी व सदस्य ज्यादा से ज्यादा संख्या में पधारें। 

शनिवार, 26 जुलाई 2014

जय दादा गुरूदेव

जैन धर्म के सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार में पूर्वाचार्यों का पूर्ण योगदान रहा है! सभी गच्छों में महान आचार्य हुए है, जिन्होंने अपनी क्षमता बुद्धि-बल एवं तपोबल के आधार पर जिन शासन की महिमा फैलाई।
लेकिन दादा गुरुदेव केवल खरतर गच्छ में ही हुए। बल्कि यों कहना चाहिए कि खरतरगच्छ के चार आचार्यों को ही दादा गुरुदेव का संबोधन मिला। अन्य गच्छों के महान आचार्यों के लिए कई अन्य विशेषण प्रयुक्त हुए। लेकिन दादा गुरुदेव का अर्थवान और लाडला संबोधन तो खरतरगच्छ के चार आचार्यों-जिनदत्तसुरिजी, मणिधारी जिनचंद्रसूरिजी, जिनकुशलसूरिजी और जिनचंद्रसूरिजी को ही प्राप्त हुआ है। 
श्री जिनदत्तसूरिजी आदि चार आचार्यों का जो उपकारक जीवन रहा है उसी के परिणाम स्वरूप उन्हें दादा गुरुदेव का संबोधन मिला।
अपने गुरुजनों की स्मृति में बनने वाले गुरु मंदिरों को गुरु मंदिर ही कहें, दादावाडी नहीं। समस्त भारत में दादावाडी का अर्थ यह सुप्रसिद्ध है कि यह जिनदत्तसूरिजी या मणिधारीजी या जिनकुशलसूरिजी का स्थान होगा।
समाज ने उनके दिव्य व्यक्तित्व एवं योगदान का जो मूल्यांकन किया, वही दादा गुरुदेव के संबोधन के रूप में अभिव्यक्त हुआ। आज सेंकडों वर्षों से स्थान-स्थान पर दादावाडियां उनकी पावन स्मृति में उनके प्रति —तज्ञता स्वरुप बनती आ रही है।
अजमेर की 800 वर्ष पुरानी दादावाडी, मालपुरा की 700 वर्ष प्राचीन दादावाडी, महरोली की 800 वर्ष प्राचीन दादावाडी, अहमदाबाद की 400 वर्ष प्राचीन दादावाडी आदि सैंकडों दादावाडियां आज ददागुरुदेव की गौरव गाथा गा रही है।
जय दादा गुरूदेव